आदिकालीन हिंदी साहित्य का इतिहास: उद्भव, प्रवृत्तियां और प्रमुख रचनाएं
हिंदी साहित्य का इतिहास अपने भीतर भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और भाषा के क्रमिक विकास की एक लंबी और समृद्ध गाथा समेटे हुए है। अध्ययन की सुविधा के लिए विद्वानों ने हिंदी साहित्य के लगभग एक हजार वर्षों के इतिहास को मुख्य रूप से चार कालों में विभाजित किया है— आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल। इनमें से ‘आदिकाल’ हिंदी साहित्य का वह प्रारंभिक चरण है, जिसने भविष्य के साहित्य के लिए एक ठोस आधारशिला तैयार की।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आदिकाल की समय सीमा संवत 1050 से 1375 विक्रमी (सन् 993 ई. से 1318 ई.) तक मानी है। यह वह समय था जब प्राकृत और अपभ्रंश भाषाएं अपने अंतिम चरण में थीं और आधुनिक आर्य भाषा ‘हिंदी’ अपना रूप ग्रहण कर रही थी।
1. नामकरण की समस्या और विभिन्न मत
आदिकाल के नामकरण को लेकर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों में गहरे मतभेद रहे हैं। इस काल में किसी एक विशेष प्रकार के साहित्य की प्रधानता नहीं थी, बल्कि धर्म, वीरगाथा, और श्रृंगार से जुड़ी विविध रचनाएं एक साथ लिखी जा रही थीं। इसी कारण विभिन्न विद्वानों ने इसे अलग-अलग नाम दिए:
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वीरगाथा काल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल में राजाओं की प्रशंसा और युद्धों के वर्णन से युक्त ‘रासो ग्रंथों’ (जैसे पृथ्वीराज रासो, परमाल रासो) की प्रचुरता को देखते हुए इसे ‘वीरगाथा काल’ नाम दिया।
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आदिकाल: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘आदिकाल’ कहना अधिक उपयुक्त माना, क्योंकि यह हिंदी भाषा और साहित्य का प्रारंभिक युग था जिसमें कई प्रवृत्तियों का बीजारोपण हुआ। आज यही नाम सर्वाधिक मान्य है।
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चारण काल / सन्धि काल: डॉ. रामकुमार वर्मा ने इसे यह नाम दिया क्योंकि इस समय के कवि अधिकतर चारण या भाट हुआ करते थे जो दरबारों में आश्रय पाते थे।
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सिद्ध-सामंत युग: महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस युग के बौद्ध सिद्धों और सामंती व्यवस्था के प्रभाव को देखते हुए यह नाम सुझाया।
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बीजवपन काल: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसे साहित्य के बीजारोपण का समय माना।
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आरंभिक काल: मिश्र बंधुओं ने इसे यह साधारण नाम दिया।
2. आदिकालीन पृष्ठभूमि
किसी भी काल का साहित्य उसकी तत्कालीन परिस्थितियों की उपज होता है। आदिकालीन साहित्य को समझने के लिए उस समय की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है:
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राजनीतिक परिस्थितियां: यह युग भारतीय इतिहास में घोर राजनीतिक अस्थिरता का था। सम्राट हर्षवर्धन (सातवीं शताब्दी) की मृत्यु के बाद उत्तर भारत का विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था। देश छोटे-छोटे राजपूत राज्यों (जैसे चौहान, चंदेल, परमार) में बंट गया था। ये राजपूत राजा झूठे अभिमान और तुच्छ कारणों से आपस में लड़ते रहते थे। इसी आपसी फूट का फायदा उठाकर पश्चिम से महमूद गजनवी और मुहम्मद गौरी जैसे विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत पर हमले शुरू कर दिए थे।
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धार्मिक परिस्थितियां: धार्मिक दृष्टि से भी यह उथल-पुथल का समय था। वैदिक धर्म के समानांतर बौद्ध धर्म का पतन हो रहा था और वह ‘वज्रयान’ या ‘सहजयान’ के रूप में विकृत होकर तंत्र-मंत्र और जादू-टोने में बदल गया था। इसके विरोध में नाथ पंथ का उदय हुआ। वहीं पश्चिम भारत में जैन धर्म का प्रभाव था।
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सामाजिक परिस्थितियां: समाज में जाति-प्रथा अत्यंत कठोर हो चुकी थी। राजपूतों में वीरता और बलिदान की भावना तो थी, लेकिन सती प्रथा और जौहर जैसी कुप्रथाएं भी समाज में जड़ जमा चुकी थीं। युद्धों के कारण आम जनता का जीवन असुरक्षित और त्रासदायक था।
3. आदिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियां (विशेषताएं)
आदिकालीन साहित्य, विशेषकर रासो साहित्य में निम्नलिखित प्रमुख प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं:
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युद्धों का सजीव वर्णन: इस काल के कवि केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि वे तलवार के भी धनी थे। वे युद्ध भूमि में अपने आश्रयदाता राजाओं के साथ जाते थे। इसलिए उनके द्वारा किए गए युद्धों के वर्णन अत्यधिक सजीव, वास्तविक और हृदयग्राही हैं।
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ऐतिहासिकता का अभाव: यद्यपि रचनाओं के नायक पृथ्वीराज चौहान या बीसलदेव जैसे ऐतिहासिक महापुरुष हैं, लेकिन कवियों ने अपनी कल्पना का इतना अधिक प्रयोग किया है कि उनमें ऐतिहासिक तथ्य दब गए हैं। तिथियों, घटनाओं और पात्रों के मामले में ये ग्रंथ इतिहास की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
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संकुचित राष्ट्रीयता: उस समय ‘राष्ट्र’ की भावना अत्यंत संकुचित थी। सौ-पचास गांवों या एक छोटे से राज्य को ही राजा अपना राष्ट्र मानते थे। पड़ोसी राज्य पर हमला विदेशी आक्रमणकारियों से भी अधिक महत्वपूर्ण माना जाता था। संपूर्ण भारत को एक राष्ट्र मानने की चेतना का सर्वथा अभाव था।
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वीर और श्रृंगार रस की प्रधानता: युद्धों का मुख्य कारण प्रायः कोई सुंदर राजकुमारी हुआ करती थी। इसलिए आश्रयदाताओं की वीरता (वीर रस) और राजकुमारियों के रूप-सौंदर्य (श्रृंगार रस) का अद्भुत समन्वय इस काल के साहित्य में मिलता है।
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डिंगल और पिंगल भाषा का प्रयोग: वीर रस के वर्णन के लिए अपभ्रंश और राजस्थानी के मिश्रण से बनी कर्कश भाषा ‘डिंगल’ का प्रयोग किया गया। वहीं, कोमल भावों और श्रृंगार के लिए अपभ्रंश और ब्रज भाषा के मधुर मिश्रण ‘पिंगल’ का प्रयोग हुआ।
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विविध छंदों का प्रयोग: चंदबरदाई और जगनिक जैसे कवियों ने दोहा, चौपाई, छप्पय, तोमर, त्रोटक, और गाहा जैसे अनेक छंदों का इतनी कुशलता से प्रयोग किया है कि चंदबरदाई को ‘छंदों का सम्राट’ कहा जाता है।
4. आदिकालीन साहित्य का वर्गीकरण
आदिकाल के साहित्य को उसकी विषय-वस्तु के आधार पर मुख्य रूप से पांच भागों में बांटा जा सकता है:
(क) रासो साहित्य (वीरगाथात्मक साहित्य)
यह आदिकाल का सबसे प्रमुख साहित्य है जो चारण कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा में लिखा गया।
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पृथ्वीराज रासो: चंदबरदाई द्वारा रचित यह हिंदी का पहला महाकाव्य माना जाता है। इसमें दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के शौर्य और संयोगिता के साथ उनके प्रेम का वर्णन है।
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बीसलदेव रासो: नरपति नाल्ह द्वारा रचित यह एक विरह-काव्य (श्रृंगारिक रचना) है, जिसमें अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव और मालवा की राजकुमारी राजमती की कथा है।
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परमाल रासो (आल्हाखंड): जगनिक द्वारा रचित यह ग्रंथ लोक-काव्य के रूप में प्रसिद्ध है। इसमें महोबा के वीर योद्धाओं ‘आल्हा’ और ‘ऊदल’ की वीरता का रोंगटे खड़े कर देने वाला वर्णन है।
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खुमान रासो: दलपति विजय द्वारा रचित इस ग्रंथ में मेवाड़ के राजा खुमान के युद्धों का वर्णन है।
(ख) सिद्ध साहित्य
आठवीं शताब्दी के आसपास पूर्वी भारत (बिहार, बंगाल) में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के साधुओं को ‘सिद्ध’ कहा जाता था। इनकी संख्या 84 मानी जाती है।
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इन्होंने तंत्र-मंत्र और वाममार्गी साधना पर बल दिया।
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सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि माना जाता है। शबरपा, लुइपा, डोम्भिपा और कण्हपा अन्य प्रमुख सिद्ध कवि थे। इन्होंने पाखंडों का विरोध किया और गुरु महिमा व ‘सहज साधना’ पर जोर दिया।
(ग) नाथ साहित्य
सिद्धों की वाममार्गी और भोग-प्रधान साधना की प्रतिक्रिया स्वरूप पश्चिम भारत में नाथ संप्रदाय का उदय हुआ। इसके प्रवर्तक मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ थे। नाथों की संख्या 9 मानी जाती है।
(घ) जैन साहित्य
पश्चिम भारत (मुख्यतः गुजरात और राजस्थान) में जैन मुनियों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए जो साहित्य अपभ्रंश और हिंदी में लिखा, वह जैन साहित्य कहलाता है।
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इन्होंने हिंदू धर्म की रामकथा और कृष्णकथा को जैन आदर्शों के सांचे में ढालकर प्रस्तुत किया।
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स्वयंभू को ‘अपभ्रंश का वाल्मीकि’ कहा जाता है। उनका महाकाव्य ‘पउम चरिउ’ (जैन रामायण) अत्यंत प्रसिद्ध है। पुष्पदंत (महापुराण) और धनपाल (भविष्यत्त कहा) अन्य प्रमुख जैन कवि थे।
(ङ) लौकिक साहित्य (विद्यापति और अमीर खुसरो)
दरबारी और धार्मिक दायरों से बाहर निकलकर जनजीवन और मनोरंजन के लिए भी आदिकाल में उत्कृष्ट साहित्य रचा गया।
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विद्यापति: इन्हें ‘मैथिल कोकिल’ कहा जाता है। इनकी रचना ‘पदावली’ में राधा और कृष्ण के प्रेम का अत्यंत मधुर और श्रृंगारिक वर्णन है। इन्होंने ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ जैसी वीरगाथात्मक रचनाएं भी कीं।
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अमीर खुसरो: खुसरो खड़ी बोली हिंदी के प्रथम कवि माने जाते हैं। उन्होंने आम जनता के मनोरंजन के लिए पहेलियां, मुकरियां, और दो-सुखने लिखे। खुसरो हिंदू-मुस्लिम समन्वित संस्कृति के पहले बड़े प्रतीक थे।
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ढोला मारू रा दूहा: यह राजस्थान का एक अत्यंत लोकप्रिय लोक-काव्य है, जिसमें राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारवणी की प्रेम कथा का वर्णन है।
निष्कर्ष
आदिकालीन हिंदी साहित्य, भाषा और भाव दोनों ही दृष्टियों से संक्रमण का काल था। यह वह समय था जब अपभ्रंश की कोख से हिंदी जन्म ले रही थी। यद्यपि इस काल का साहित्य युद्धों की विभीषिका, राजनीतिक उथल-पुथल और धार्मिक भटकाव के बीच लिखा गया, फिर भी इसमें जीवन के हर रंग— वीरता, प्रेम, वैराग्य, रहस्य और मनोरंजन— का समावेश है।
आदिकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने उन काव्य-रूपों (जैसे महाकाव्य, मुक्तक काव्य, दोहा, चौपाई) और भाषाई प्रवृत्तियों की नींव रखी, जिन पर आगे चलकर भक्तिकाल (कबीर, तुलसी, सूर, जायसी का युग) का भव्य और शाश्वत महल खड़ा हुआ। इसलिए, हिंदी साहित्य के विकास-क्रम को समझने के लिए आदिकाल का अध्ययन नितांत आवश्यक और महत्वपूर्ण है।