भारतीय संस्कृति और ज्ञान का विश्वकोश: पुराणों का विस्तृत अध्ययन | A Comprehensive Study of the Puranas

भारतीय संस्कृति और ज्ञान का विश्वकोश: पुराणों का विस्तृत अध्ययन

प्रस्तावना: पुराणों का अर्थ एवं व्यापक दृष्टिकोण

भारतीय वाङ्मय और सनातन साहित्य में वेदों के पश्चात् पुराणों का सर्वाधिक महत्त्व माना गया है। ‘पुराण’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘प्राचीन’ या ‘पुराना’। प्राचीन काल से चली आ रही ज्ञान-परंपरा, कथाओं और आख्यानों का जो लिखित संग्रह है, उसे ही पुराण की संज्ञा दी गई है। महर्षि वेदव्यास जी ने वेदों की अत्यंत जटिल और गूढ़ भाषा को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए पुराणों की रचना एवं पुनर्रचना की।
पुराणों में वर्णित विषयों की कोई निश्चित सीमा नहीं है; ये अपने आप में ज्ञान का अथाह सागर हैं। इनमें केवल प्राचीन कथानक या देवी-देवताओं की स्तुति ही नहीं है, बल्कि इनमें वंशावली, इतिहास, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान, खगोल शास्त्र, व्याकरण, हास्य-व्यंग्य, और प्रेमकथाओं के साथ-साथ धर्मशास्त्र एवं दर्शन का गहन विवेचन किया गया है। सृष्टि के आरंभ (उत्पत्ति) से लेकर प्रलय (अंत) तक का अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक वर्णन पुराणों के पृष्ठों में समाहित है।

पुराणों के पञ्चलक्षण (पाँच प्रमुख विशेषताएँ)

प्राचीन संस्कृत साहित्य और ‘अमरकोष’ आदि प्रामाणिक कोषों में किसी भी ग्रंथ को ‘पुराण’ का दर्जा देने के लिए उसके पाँच अनिवार्य लक्षण (पञ्चलक्षण) बताए गए हैं। इसका वर्णन निम्नलिखित श्लोक के माध्यम से किया गया है:
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च |
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ||
इन पाँचों लक्षणों का विस्तृत अर्थ इस प्रकार है:
  • सर्ग: इसका तात्पर्य है सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन। ब्रह्मांड का निर्माण कैसे हुआ, पंचमहाभूतों की उत्पत्ति कैसे हुई, इसका विवेचन सर्ग कहलाता है।
  • प्रतिसर्ग: प्रलय (सृष्टि का अंत) एवं उसके पश्चात् सृष्टि के पुनः प्रादुर्भाव (पुनर्जन्म) की प्रक्रिया का वर्णन प्रतिसर्ग के अंतर्गत आता है।
  • वंश: इस भाग में मुख्य रूप से देवताओं, असुरों, प्रजापतियों और महान ऋषियों की वंशावलियों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
  • मन्वंतर: काल गणना के अनुसार प्रत्येक मनु के शासन काल (मन्वंतर) और उस विशिष्ट कालखंड में घटित होने वाली प्रमुख ऐतिहासिक व भौगोलिक घटनाओं का विवरण।
  • वंशानुचरित: इसके अंतर्गत प्राचीन काल के प्रतापी सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं के जीवन चरित्र और उनके ऐतिहासिक कार्यों का वर्णन किया जाता है।

पुराणों का ऐतिहासिक एवं भौगोलिक महत्त्व

धार्मिक ग्रंथ होने के साथ-साथ पुराण प्राचीन भारत के इतिहास और भूगोल के अत्यंत प्रामाणिक स्रोत हैं। ऐतिहासिक वंशावलियों की जो शृंखलाबद्ध जानकारी पुराणों से प्राप्त होती है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। महाभारत काल के राजा परीक्षित से लेकर नंद वंश के अंतिम शासक महापद्मनंद तक का अज्ञात इतिहास पुराणों के माध्यम से ही उजागर होता है।
इतिहासकारों के लिए यह एक अमूल्य निधि है। उदाहरण के लिए, मत्स्य पुराण के माध्यम से आंध्र (सातवाहन) राजवंश की प्रामाणिक जानकारी मिलती है, जबकि वायु पुराण मौर्य राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालता है। पुराणों की रचना का समयकाल विद्वानों द्वारा लगभग 600 ई. पू. से 500 ई. पू. के मध्य माना जाता है। इनमें गुप्तकालीन राजाओं का तो वर्णन मिलता है, लेकिन सम्राट हर्षवर्धन (606 ई. – 647 ई.) और उसके बाद के राजाओं का उल्लेख नहीं मिलता, जो इसके कालखंड को प्रमाणित करता है। इसके अतिरिक्त, प्राचीन काल के समुद्रों, नदियों, और पर्वतों का जो भौगोलिक खाका पुराणों में खींचा गया है, वह आज भी शोधकर्ताओं को आश्चर्यचकित करता है।

अष्टादश (18) महापुराणों का विस्तृत परिचय

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महापुराणों की कुल संख्या 18 मानी गई है। इन सभी पुराणों का अपना एक विशिष्ट विषय और महत्त्व है। इनका विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:

1. ब्रह्मपुराण (आदि पुराण)

इसे सभी पुराणों में प्रथम माना जाता है, इसलिए इसका नाम ‘आदि पुराण’ भी है। प्राचीन सभी ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। इसका एक परिशिष्ट ‘सौर पुराण’ के नाम से जाना जाता है। इसमें 246 अध्याय और लगभग 10,000 श्लोक हैं। इस पुराण में मनु की उत्पत्ति, प्राणियों के विकास, विभिन्न तीर्थों (विशेषकर उड़ीसा के तीर्थों) का माहात्म्य वर्णित है। इसमें सूर्य को ही शिव का रूप माना गया है और राम-कृष्ण की कथाओं से अवतारवाद की स्थापना की गई है।

2. विष्णु पुराण

यह वैष्णव संप्रदाय का सबसे प्रमुख और आधारभूत पुराण है। भगवान विष्णु इसके प्रतिपाद्य देव हैं। इसमें मुख्य रूप से श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन है, साथ ही रामकथा का संक्षिप्त उल्लेख भी है। आकाश, समुद्र, सूर्य आदि के परिमाण (आकार), मन्वंतर, राजर्षियों और देवर्षियों के चरित्र का इसमें विशद वर्णन है। ऐतिहासिक दृष्टि से मौर्य राजाओं की वंशावली इसी पुराण से प्राप्त होती है।

3. भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत)

यह अठारह पुराणों में सबसे अधिक लोकप्रिय और वैष्णवों का परम प्रिय ग्रंथ है। महर्षि सूत जी द्वारा शौनकादि ऋषियों को सुनाई गई यह कथा मूल रूप से शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सुनाई थी। इसमें 12 स्कंध और 18,000 श्लोक हैं। इसके 10वें स्कंध में श्रीकृष्ण की रासलीलाओं और बाल-लीलाओं का अत्यंत मनोहारी वर्णन है। सूरदास सहित हिंदी साहित्य के अनेक भक्त कवियों ने इसी पुराण को अपने काव्य का आधार बनाया है।

4. अग्नि पुराण

उपयोगिता और ज्ञान के विस्तार की दृष्टि से अग्निपुराण को प्राचीन भारत का ‘विश्वकोश’ (Encyclopedia) कहा जा सकता है। इसके वक्ता स्वयं भगवान अग्निदेव हैं। इस ग्रंथ में तत्कालीन समाज की लगभग सभी विद्याओं का समावेश है—जैसे व्याकरण, ज्योतिष, आयुर्वेद, गंधर्ववेद, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र और वैदिक कर्मकांड। इसमें विष्णु और शिव पूजा के विधान भी वर्णित हैं।

5. मत्स्य पुराण

भगवान श्रीहरि के मत्स्य अवतार पर केंद्रित इस पुराण में 14,000 श्लोक हैं। इसमें जलप्रलय, मनु और मत्स्य के संवाद तथा त्रिदेवों की महिमा का वर्णन है। ऐतिहासिक रूप से यह आंध्र राजाओं की वंशावली के लिए प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त, इसमें दक्षिण भारत की वास्तुकला, मूर्तिकला, जैन और बौद्ध धर्म का भी संदर्भ प्राप्त होता है।

6. मार्कण्डेय पुराण

यह अत्यंत प्राचीन पुराण है जिसे मार्कण्डेय ऋषि ने क्रोष्ठि को सुनाया था। इसमें ब्रह्मा, अग्नि, सूर्य और इंद्र को मुख्य देवता माना गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता देवी भगवती की महिमा का गान है। इसी पुराण का एक भाग ‘दुर्गा सप्तशती’ है, जिसका पाठ नवरात्रों में विशेष रूप से किया जाता है।

7. ब्रह्माण्ड पुराण

12,000 श्लोकों वाले इस पुराण में पौराणिक भूगोल, विश्व का खगोल शास्त्र और तीर्थों का माहात्म्य मुख्य विषय हैं। इस पुराण के सात खंडों के अंतर्गत अत्यंत प्रसिद्ध ‘अध्यात्म रामायण’ का भी समावेश है।

8. भविष्य पुराण

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसमें भविष्य में होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणियाँ की गई हैं। इसके साथ ही धर्म, नीति, सदाचार, व्रत, उपदेश, दान, ज्योतिष और आयुर्वेद जैसे लोकोपयोगी विषयों का इसमें सुंदर विवेचन किया गया है।

9. ब्रह्मवैवर्त पुराण

इस पुराण का मुख्य दर्शन यह है कि संपूर्ण सृष्टि ‘ब्रह्म’ का ही विवर्त (रूप) है। इसके चार खंड हैं— ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, गणेश खण्ड, और कृष्ण जन्म खण्ड। इसमें जीवों की उत्पत्ति, पालन-पोषण के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण की गोलोक लीला और श्री राधा जी के अवतार का अत्यंत सुंदर दार्शनिक विवेचन किया गया है।

10. वामन पुराण

10,000 श्लोकों से युक्त इस ग्रंथ में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा विस्तार से दी गई है। इसमें भक्त प्रह्लाद, नर-नारायण और श्रीदामा के प्रेरक आख्यानों का सुंदर संकलन है।

11. वाराह पुराण

इसमें 218 अध्यायों के अंतर्गत 24,000 श्लोक हैं। भगवान विष्णु के वाराह अवतार को समर्पित इस पुराण में पृथ्वी और वाराह भगवान का ज्ञानवर्धक संवाद है। महिषासुर के वध में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की शक्तियों का वर्णन, गौरी उत्पत्ति और मथुरा के तीर्थों का माहात्म्य इसमें प्रमुखता से वर्णित है।

12. नारद पुराण

इसे ‘बृहन्नारदीय पुराण’ भी कहा जाता है और यह स्वयं देवर्षि नारद के मुख से कहा गया है। इसके दो खंडों (125 और 82 अध्याय) में लगभग 22,000 श्लोक हैं। इसमें वेदांगों का वर्णन, बारह महीनों की व्रत कथाएँ, गंगा माहात्म्य और मोक्ष प्राप्ति के विलक्षण साधन बताए गए हैं।

13. वायु पुराण (शिव पुराण)

कई विद्वान इसे शिव पुराण भी कहते हैं। इसमें 112 अध्याय और 10,000 श्लोक हैं। वायुदेव द्वारा श्वेत कल्प के प्रसंगों में धर्म उपदेश दिया गया है। दो भागों (पूर्व और उत्तर) में बँटे इस ग्रंथ में विभिन्न मन्वंतरों के राजवंशों, भूगोल, खगोल, ऋषिवंश और विशेषकर भगवान शिव की उपासना का अत्यंत विस्तार से वर्णन है।

14. पद्म पुराण

श्लोकों की संख्या (55,000) के आधार पर यह दूसरा सबसे बड़ा पुराण है। ‘पद्म’ का अर्थ कमल होता है; ब्रह्मा जी की उत्पत्ति नारायण के नाभि-कमल से होने के कारण इसका यह नाम पड़ा। इसके 5 खंड हैं— सृष्टि, भूमि, स्वर्ग, पाताल और उत्तरखंड। इसमें राम और कृष्ण के चरित्र, विभिन्न व्रतों और तुलसी की महिमा का वर्णन है। इसमें राधा जी को कृष्ण की पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

15. लिंग पुराण

11,000 श्लोकों वाले इस पुराण में भगवान महेश्वर (शिव) को आदि पुरुष माना गया है और उनके 28 अवतारों का वर्णन किया गया है। इसमें शिवलिंग की पूजा का दार्शनिक और आध्यात्मिक माहात्म्य बताया गया है, जहाँ ‘लिंग’ का अर्थ ज्योति रूपा चिन्मय शक्ति के चिह्न या प्रतीक से है।

16. कूर्म पुराण

पूर्व में इसकी चार संहिताएँ थीं, परंतु वर्तमान में केवल ‘ब्राह्मी संहिता’ ही प्राप्त है जिसमें 6,000 श्लोक हैं। कूर्म अवतार धारण कर भगवान विष्णु ने इसे राजा इंद्रद्युम्न को सुनाया था। इसमें ईश्वर गीता और व्यास गीता का समावेश है। साथ ही युगों की कालगणना, योगशास्त्र, वामन अवतार कथा और यदुवंश का सुंदर वर्णन है।

17. गरुड़ पुराण

वैष्णव संप्रदाय के इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुराण में 18,000 श्लोक हैं। पक्षीराज गरुड़ की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने जो ज्ञान दिया, वह इसमें संकलित है। इसे विशेष रूप से मृत्यु के उपरांत सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। इसमें जीव की यमलोक यात्रा, स्वर्ग-नरक की व्यवस्था, और मोक्ष के मार्गों का गूढ़ विवेचन है। इसके अतिरिक्त ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण और नीतिसार जैसे विषय भी इसमें शामिल हैं।

18. स्कंद पुराण

यह सभी 18 पुराणों में सबसे विशालकाय है, जिसमें 81,000 श्लोक और 7 खंड (माहेश्वर, वैष्णव, ब्रह्म, काशी, अवंती, नागर, प्रभास) हैं। भगवान कार्तिकेय (स्कंद) द्वारा कहे जाने के कारण इसका नाम स्कंद पुराण पड़ा। इसमें शिव-पार्वती विवाह, तारकासुर वध और सती चरित्र का वर्णन है। भौगोलिक दृष्टि से यह बहुत समृद्ध है, क्योंकि इसमें अयोध्या, काशी, द्वारका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम् जैसी तीर्थ नगरियों की विस्तृत महिमा का वर्णन किया गया है। दक्षिण भारत में इस पुराण का विशेष प्रभाव है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पुराण केवल प्राचीन कहानियों का संग्रह नहीं हैं, अपितु ये भारतीय समाज, संस्कृति, इतिहास और जीवन-मूल्यों का एक जीता-जागता दस्तावेज़ हैं। वेदों का जो ज्ञान अत्यंत दार्शनिक और आम मनुष्य की पहुँच से बाहर था, उसे पुराणों ने रोचक कथाओं और सरल भाषा के माध्यम से घर-घर तक पहुँचाया। आज भी भारतीय जनमानस के पर्व, त्योहार, व्रत और तीर्थाटन पुराणों से ही निर्देशित होते हैं।

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